महाकुंभ 2025: रीति-रिवाजों से नदी पुनर्जीवन पर संगोष्ठी का सफल समापन
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग, मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी) और संस्कृति फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित "महाकुंभ 2025: रीति-रिवाजों से नदी पुनर्जीवन" विषयक दो दिवसीय संगोष्ठी का समापन मंगलवार को हुआ। संगोष्ठी में विभिन्न विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों ने नदी संरक्षण, नीति निर्माण और सामुदायिक सहभागिता पर विचार-विमर्श किया।
संगोष्ठी का शुभारंभ और उद्देश्य
संगोष्ठी का उद्घाटन प्रो. धनंजय यादव के स्वागत भाषण से हुआ, जिसमें उन्होंने महाकुंभ 2025 के परिप्रेक्ष्य में इस संगोष्ठी की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। संस्कृति फाउंडेशन के डॉ. अमरनाथ रेड्डी मंचुरी ने संगोष्ठी के उद्देश्यों और नदी पुनर्जीवन में रीति-रिवाजों की भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक परंपराओं के माध्यम से नदी संरक्षण को बढ़ावा दिया जा सकता है और समुदाय को इसमें सक्रिय रूप से जोड़ा जाना चाहिए।
मुख्य वक्ता का संबोधन: वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नदी पुनर्जीवन
मुख्य वक्ता प्रो. शिव मोहन प्रसाद (एमेरिटस वैज्ञानिक, वनस्पति विज्ञान विभाग) ने वैज्ञानिक दृष्टि से नदी पुनर्जीवन की अवधारणा को समझाया। उन्होंने कहा कि नदी संरक्षण केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है।
उन्होंने बताया कि नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संयोजन आवश्यक है। जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण, अपशिष्ट जल प्रबंधन और वनस्पति पुनर्वास जैसी वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर नदियों को बचाया जा सकता है।
सतत नदी संरक्षण के लिए नीति निर्माण और सामुदायिक सहभागिता की आवश्यकता
मुख्य अतिथि डॉ. डब्ल्यूजी प्रसन्ना कुमार ने सतत नदी संरक्षण के लिए नीति निर्माण और सामुदायिक सहभागिता की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि केवल सरकारी नीतियाँ ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि स्थानीय समुदायों को भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे विभिन्न देशों में सामुदायिक भागीदारी से नदियों का पुनर्जीवन संभव हुआ है। उन्होंने सुझाव दिया कि महाकुंभ जैसे बड़े आयोजनों के दौरान पर्यावरणीय जागरूकता बढ़ाने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।
विशेषज्ञों के विचार: नीति और क्रियान्वयन की चुनौतियाँ
संगोष्ठी में विभिन्न विशेषज्ञों ने नदी संरक्षण नीतियों के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों और उनके समाधान पर विचार साझा किए।
- प्रो. आशीष सक्सेना ने कहा कि नदी संरक्षण के लिए मजबूत कानूनी ढांचे और कठोर कार्यान्वयन की आवश्यकता है।
- प्रो. एआर सिद्दीकी ने कहा कि नदियों के प्रदूषण को रोकने के लिए सामुदायिक भागीदारी और स्वच्छता अभियानों को और प्रभावी बनाया जाना चाहिए।
- प्रो. अविक सरकार ने कहा कि डेटा विश्लेषण और डिजिटल तकनीकों का उपयोग करके नदियों की गुणवत्ता की निगरानी की जानी चाहिए।
समापन सत्र: सतत शोध और सहयोग पर बल
संगोष्ठी के समापन सत्र में डॉ. एसवी विजय कुमार ने कहा कि नदी संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और समाज के हर वर्ग को इसमें योगदान देना होगा। उन्होंने सतत शोध और सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित किया।
मुख्य अतिथि प्रो. पीके साहू ने संगोष्ठी की सराहना की और इस विषय पर आगे शोध को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को नदी संरक्षण पर विशेष परियोजनाएँ चलानी चाहिए ताकि ठोस समाधान निकाले जा सकें।
प्रमाण पत्र वितरण और समापन
संगोष्ठी के अंत में प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए। सभी विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने इस संगोष्ठी को सार्थक और उपयोगी बताया। यह संगोष्ठी महाकुंभ 2025 के दौरान नदी संरक्षण को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुई।
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